वाराणसी: डॉक्टर तृप्ति सिंह की मार्मिक कहानी, अन्याय के खिलाफ संघर्ष

वाराणसी: डॉक्टर तृप्ति सिंह की मार्मिक कहानी, अन्याय के खिलाफ संघर्ष
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गोरखपुर विश्वविद्यालय की पवित्र भूमि पर एक शिक्षिका का सपना पलता है—डॉक्टर तृप्ति सिंह, जिन्होंने अपने अथक परिश्रम और असीम समर्पण से खेल और शिक्षा के क्षेत्र में अद्वितीय उपलब्धियाँ हासिल कीं। विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति के समय उन्हें यह वादा किया गया था कि तीन साल बाद उनकी नियुक्ति को स्थायी कर दिया जाएगा। मगर, यह वादा मात्र छलावा साबित हुआ। तृप्ति के पति सतपाल सिंह के अनुसार।
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विनय मौर्या
बनारस।
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(@ExpressGoyal) April 2, 2025
भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी होती हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण तब मिला जब कुलपति राजेश सिंह ने उन्हें नियुक्ति के बदले घूस की मांग की। नैक टीम के आगमन से पूर्व, तृप्ति सिंह ने दिन-रात परिश्रम करके खेल के मैदानों को संवारने का कार्य किया, वर्षों से उपेक्षित ट्रैक को जीवंत किया, और विश्वविद्यालय को नई ऊर्जा से भर दिया। उनकी निष्ठा और कर्तव्यपरायणता को नैक टीम ने सराहा, मगर उनके समर्पण के बदले उन्हें सिर्फ अन्याय और शोषण मिला। नौ महीनों तक उनकी वेतन राशि रोक दी गई, और भ्रष्ट कुलपति ने उनसे व्यक्तिगत लाभ के लिए महंगे इटालियन सूट तक की मांग कर दी।
22 फरवरी 2020 को डॉक्टर तृप्ति सिंह जी द्वारा अपने फेसबुक प्रोफाइल पर डाला गया पोस्ट जिसमें उनके द्वारा बताया गया कि, लखनऊ के मंडलायुक्त कमिश्नर श्री मुकेश मेश्राम जी, लखनऊ के जिला अधिकारी श्री अभिषेक प्रकाश जी और वाराणसी के जिलाधिकारी श्री कौशल राज शर्मा जी जब मेरा उत्साहवर्धन करते हुए मुझे बुके देकर भारत माता के तिरंगे के साथ मुझे वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप के लिए बधाईयां दी, पोस्ट देखने के लिए इस लिंक पर जाएं LINK
जब तृप्ति ने न्याय की गुहार लगाई, तो उन्हें गोरखपुर विश्वविद्यालय के चक्कर काटने पर मजबूर कर दिया गया। आखिरकार, उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में ज्वाइन कर लिया, मगर यहाँ भी वही कहानी दोहराई गई। एक शिक्षिका जो अपने हक के लिए लड़ रही थी, उसे एक विभागाध्यक्ष, डॉ. रूपेश कुमार द्वारा अनुचित रूप से विश्वविद्यालय से बाहर कर दिया गया।
अन्याय यहीं नहीं रुका। उनके नाम पर अवैध रूप से 2 लाख रुपये की आवासीय रिकवरी थोप दी गई, जबकि उन्हें कोई आवास आवंटित ही नहीं किया गया था। जब उन्होंने स्पोर्ट्स कॉलेज प्राचार्य की परीक्षा के लिए आवेदन किया, तो उनका इंटरव्यू लेटर दबा दिया गया। जब तक वे वरिष्ठ अधिकारियों से न्याय की मांग नहीं करतीं, तब तक उनके नाम पर इंटरव्यू पत्र जारी नहीं हुआ। और फिर, एक ही पद के लिए तीन बार इंटरव्यू लेटर जारी किए गए—पहले 25 लाख, फिर 35 लाख, और अंत में 45 लाख की रिश्वत की मांग की गई। यह स्पष्ट था कि उनकी प्रतिभा और मेहनत की कोई कीमत नहीं थी, भ्रष्टाचार के इस दलदल में केवल धन ही निर्णायक था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” और “पढ़ेंगी बेटियां, तो आगे बढ़ेंगी बेटियां” का नारा देते हैं, मगर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहती है। अगर एक उच्च शिक्षित, समर्पित शिक्षिका और खिलाड़ी को इस प्रकार से अपमानित और प्रताड़ित किया जा सकता है, तो आम बेटियों का क्या होगा? क्या सरकार की ये घोषणाएँ केवल खोखले शब्द हैं, जिन्हें भ्रष्टाचारियों ने अपने लाभ के लिए ढाल बना लिया है।
डॉ. तृप्ति सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने न्याय की लड़ाई जारी रखी है, क्योंकि एक खिलाड़ी कभी हार नहीं मानता। मगर, यह केवल उनकी लड़ाई नहीं है, यह हर उस बेटी की लड़ाई है जो सपने देखती है, जो पढ़ना चाहती है, जो आगे बढ़ना चाहती है। जब तक इन भ्रष्टाचारियों की कुर्सी सलामत रहेगी, तब तक बेटियों के सपनों का गला घोंटा जाता रहेगा। उत्पीड़न और सदमे से तृप्ति बीमार हो गईं।
तृप्ति सिंह के पति सतपाल सिंह लगातार तृप्ति के साथ हुए अन्याय की गुहार लगा रहे हैं। मगर उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँच रही है। जाति के नाम पर संगठन-सेना चलाने वालों, तनिक तृप्ति सिंह को न्याय दिलाने के लिए एक नजर डालो—यह भी क्षत्रिय है।
यह कहानी केवल तृप्ति सिंह की नहीं, यह उन लाखों बेटियों की कहानी है जो न्याय की आस में दर-दर भटक रही हैं। क्या हम इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे? क्या हम उस समाज का निर्माण करेंगे, जहाँ बेटियों को उनका हक बिना किसी डर और भ्रष्टाचार के मिले? यह प्रश्न हम सबके सामने है।
विनय मौर्या
बनारस